LIC Housing Finance ने डॉ. सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामले में NCLT के आदेश पर अपनी स्थिति साफ की है। कंपनी का कहना है कि कॉरपोरेट लोन से जुड़ी सिक्योरिटी सुरक्षित है और इस प्रक्रिया का असर उस पर नहीं पड़ेगा।
NCLT ऑर्डर पर LIC Housing Finance का रुख
हाल ही में दिल्ली NCLT द्वारा डॉ. सुभाष चंद्रा की पर्सनल इनसॉल्वेंसी कार्यवाही को लेकर आई खबरों के बाद निवेशकों में चिंता थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कंपनी के ₹1,322.39 करोड़ के क्लेम और उसके मुकाबले ₹38.09 लाख के प्रस्तावित रिपेमेंट प्लान के बीच के बड़े अंतर पर सवाल उठाए गए थे। अब LICHFL ने इन चिंताओं को दूर करते हुए स्पष्ट किया है कि कंपनी का सिक्योरिटी इंट्रेस्ट पूरी तरह बरकरार है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
शेयरहोल्डर्स इस बात को लेकर सशंकित थे कि क्या इस हाई-प्रोफाइल केस से कंपनी की बैलेंस शीट पर कोई नेगेटिव असर पड़ेगा। हालांकि, कंपनी ने यह साफ कर दिया है कि जिन एसेट्स को गिरवी (Mortgage) रखा गया था, उन पर कंपनी के अधिकार पहले की तरह लागू रहेंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि गारंजर (Guarantor) की पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया कंपनी के रिकवरी अधिकारों को प्रभावित नहीं कर रही है।
कॉरपोरेट लोन पर क्या है असर?
LICHFL ने जोर देकर कहा है कि यह ऑर्डर केवल IBC के तहत सुभाष चंद्रा की पर्सनल इनसॉल्वेंसी तक सीमित है। इसका उन मुख्य कॉरपोरेट कंपनियों की देनदारियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा जिन्होंने ये लोन लिए थे। असल में, मुख्य उधारकर्ताओं और गारंजर की इनसॉल्वेंसी स्थिति दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
आगे क्या देखना होगा?
हालांकि कंपनी ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है, लेकिन निवेशकों को अब यह ट्रैक करना होगा कि मुख्य कॉरपोरेट उधारकर्ताओं से रिकवरी किस तरह आगे बढ़ती है। गिरवी रखी गई संपत्ति (Collateral) की नीलामी या रेजोल्यूशन की प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि कंपनी को अंततः कितना पैसा वापस मिल पाएगा।
