Aksh Optifibre की डोमिनो इफेक्ट! कंपनी इंसॉल्वेंसी में, ऑडिटर्स ने भी उठाए सवाल

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Aksh Optifibre की डोमिनो इफेक्ट! कंपनी इंसॉल्वेंसी में, ऑडिटर्स ने भी उठाए सवाल

Aksh Optifibre के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। कंपनी को NCLT के आदेश के बाद कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में डाल दिया गया है। वहीं, ऑडिटर्स ने कंपनी की फाइनेंशियल रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए हैं, जिसमें अनबुक्ड देनदारियां और अनिश्चित निवेश शामिल हैं। साथ ही, बैंकों की ओर से भारी भरकम दावों ने चिंता बढ़ा दी है।

इंसॉल्वेंसी की तलवार और ऑडिटर्स की चेतावनी

Aksh Optifibre लिमिटेड को NCLT, जयपुर बेंच ने 19 जून, 2026 से कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में एडमिट कर लिया है। श्री प्रवीण कुमार सिंघल को अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) नियुक्त किया गया है। बाद में, NCLAT ने 30 जून, 2026 को यह निर्देश दिया कि IRP कंपनी को अपीलीय पक्ष, अधिकारियों और कर्मचारियों की मदद से चलाएगा।

कंपनी के वैधानिक ऑडिटर, P.C. Bindal & Co., ने फाइनेंशियल नतीजों पर क्वालिफाइड ओपिनियन (Qualified Opinion) दिया है। ऑडिट रिपोर्ट में कुछ मुख्य मुद्दे उठाए गए हैं, जैसे कि एडवांस ऑथराइजेशन और EPCG स्कीम से संबंधित ₹22.02 करोड़ के ब्याज और ₹8.40 करोड़ के सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी (Cenvatable Duty) को बुक न करना। कंपनी को उम्मीद है कि यह एम्नेस्टी स्कीम के तहत सुलझ जाएगा। इसके अलावा, कंपनी की विदेशी सब्सिडियरी, Aksh Technologies FZE, दुबई में ₹25.84 करोड़ के निवेश की रिकवरी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। साथ ही, भारतीय सब्सिडियरी, Aksh Composite Private Limited, के बंद होने के बावजूद ₹0.55 करोड़ के निवेश को इम्पेयर (Impair) करने में विफलता पाई गई है।

यह क्यों मायने रखता है?

CIRP की शुरुआत का मतलब है कि कंपनी का भविष्य, जिसमें उसके ऑपरेशन्स, मैनेजमेंट और एसेट्स शामिल हैं, अब इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के दायरे में आ गया है। क्वालिफाइड ऑडिट रिपोर्ट फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स की सटीकता और पूर्णता पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिससे निवेशकों का भरोसा और भविष्य में फंड जुटाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। बैंकों की ओर से बड़े आउटस्टैंडिंग क्लेम्स भी एक बड़ा फाइनेंशियल रिस्क पैदा करते हैं।

क्यों हुआ ऐसा?

Aksh Optifibre पिछले कुछ समय से फाइनेंशियल परफॉरमेंस के साथ संघर्ष कर रही थी, जिसके कारण इंसॉल्वेंसी की कार्यवाही शुरू हुई। देनदारियों को सुलझाने और सब्सिडियरीज़ में निवेश को मैनेज करने के कंपनी के प्रयासों की ऑडिटर्स ने कड़ी जांच की है।

अब क्या बदलेगा?

CIRP के तहत, मौजूदा मैनेजमेंट की शक्तियां निलंबित कर दी जाती हैं, और IRP कंपनी का कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है ताकि उसे मैनेज किया जा सके और समाधान के विकल्प तलाशे जा सकें। इसमें रिवाइवल प्लान, एसेट्स की बिक्री या लिक्विडेशन शामिल हो सकता है। कंपनी की फाइनेंशियल रिपोर्टिंग पर IRP और क्रेडिटर्स की कड़ी नजर रहेगी।

जोखिम जिन पर नज़र रखनी है

  1. CIRP का नतीजा: समाधान प्रक्रिया में ही कंपनी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
  2. ऑडिटर क्वालिफिकेशन्स: अनसुलझी अकाउंटिंग समस्याएं और अनिश्चित निवेश फाइनेंशियल जोखिम पैदा करते हैं।
  3. बैंक क्लेम्स: बैंक ऑफ बड़ौदा (₹6.96 करोड़), यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (₹49.73 करोड़), और HDFC बैंक (₹36.63 करोड़) के बड़े क्लेम्स समाधान प्लान को प्रभावित कर सकते हैं।

हालिया फाइनेंशियल आंकड़े

30 जून, 2026 को समाप्त तिमाही के लिए स्टैंडअलोन फाइनेंशियल आंकड़ों के अनुसार, ऑपरेशन्स से रेवेन्यू ₹49.87 करोड़ रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के ₹26.87 करोड़ की तुलना में काफी ज़्यादा है। कुल इनकम ₹50.23 करोड़ थी। कंपनी ने तिमाही के लिए ₹5.38 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो जून 2025 तिमाही के ₹3.76 करोड़ के लॉस से एक बड़ा सुधार है।

आगे क्या देखें

निवेशकों को CIRP में होने वाले घटनाक्रमों, IRP की कार्यवाहियों और क्रेडिटर्स की समिति द्वारा लिए जाने वाले किसी भी फैसले पर करीब से नज़र रखनी चाहिए। बैंक क्लेम्स से संबंधित नतीजे और ऑडिटर्स द्वारा चिन्हित अकाउंटिंग मुद्दों का समाधान महत्वपूर्ण होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.